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सजा तो दिलवाकर रहूंगी

आकांक्षा कुमारी

26 साल की चमन निशा से जब मैं मिली तो एकबारगी लगा ही नहीं कि मैं एक घरेलू हिंसा की शिकार महिला से मिल रही हूं, अमूमन हमारी नजर में पीड़िता की छवि एक ऐसी महिला की होती है, जिसे शायद अपनी कहानी कहने के लिए शब्दों की जरूरत ही न हो और उसका बाहरी व्यक्तित्व ही उसके दिल के राज खोल दे, लेकिन निशा के केस में ऐसा नहीं था.

जब इस केस के सिलसिले में मुझे पीड़िता से मिलने के लिए भेजा गया तो मन में एक सवाल था कि किस तरह उसके साथ गुजरी घटनाओं का जिक्र छेड़ा जाएगा और क्या मन को झकझोर देने वाले किस्से को सुनकर मैं सहज रह पाउंगी, लेकिन निशा से मिल कर इन सारे पूर्वाग्रहों से मेरा पीछा छूट गया. निशा अपनी तमाम तकलीफों के बावजूद मुझे बेहद सशक्त और मजबूत महिला नजर आई.

पूर्वी दिल्ली के सीलमपुर इलाके की निशा का निकाह 2010 में खुरेजी खास के व्यवसायी सरताज के साथ हुई थी. कॉस्मोलोजी में डिप्लोमा कर चुकी निशा तब काया में काम किया करती थी, लेकिन शादी के बाद उसे नौकरी छोड़नी पड़ी. इधर, शादी के दो तीन महीने सबकुछ ठीक रहा, लेकिन इसके बाद दहेज को लेकर जहां सास ननद ताने दिया करती थीं, वहीं देवर आबिद गलत निगाह रखकर अकेले में गंदी बातें किया करता था,जब उसने देवर की हरकत का जिक्र सास-ससुर से किया, तो उन्होंने इसे भाभी-देवर का मजाक समझ कर उस पर ध्यान नहीं दिया.

निशा ने तब तक यह बात अपने मातापिता को नहीं बताई थी,क्योंकि वह अपने मातापिता को तकलीफ नहीं देना चाहती थीं. इधर, अप्रैल 2011 में निशा ने बेटे जैद को जन्म दिया. बेटे के जन्म से निशा के मन में आश बंधी कि अब उसके दिन अच्छे हो जाएंगे, लेकिन सास-ननद की प्रताड़ना खत्म नहीं हुई और न ही देवर के आचरण में कोई सुधार हुआ.

एक साल बाद जून 2012 को निशा के साथ वही हुआ, जिसको लेकर वह सशंकित रहती थी. जून की एक शाम आबिद अपनी भाभी के कमरे में घुस गया और उसके साथ जबर्दस्ती करने की कोशिश की, जिसका विरोध करने पर आबिद ने कमरे का दरवाजा लगा लिया, हालांकि यह सब खिड़की के बाहर से उसके सास-ससुर देख रहे थे. आबिद ने दरवाजा लगाने के बाद भाभी निशा पर चाकू और ब्लेड से वार किया जिसमें उसके गर्दन के नीचे और बाईं हाथ में गहरी चोट आई, जब वह लगभग बेहोसी की हालत में जमीन पर गिर गई तब आबिद उसे वैसा ही छोड़ कर कमरे से भागा. इधर, निशा ने उसी हालत में अपने पति जो कि दुकान पर था उसे और अपने मातापिता को फोन कर इसकी जानकारी दी.

मातापिता को फोन करने पर निशा के सास ससुर घबरा गए और उन्होंने उसे एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया. निशा का पति और मातापिता भी तब तक अस्पताल पहुंच गए. लेकिन पति सरताज ने पुलिस को झूठा बयान देते हुए कहा कि पति पत्नी बाइक से आ रहे थे, जिस दौरान हुई दुर्घटना में वह घायल हो गई है.

इधर, निशा को होश आने पर उसने सारी कहानी पुलिस निरीक्षक को सुनाई लेकिन उसने उससे कहा कि वह सिर्फ अपने देवर के खिलाफ रिपोर्ट करे सास ससुर के खिलाफ नहीं वरना उसकी शादीशुदा जिंदगी प्रभावित होगी, इस बात से डर कर उसने शिकायत से सास-ससुर का नाम हटवा दिया.

 

मामला दर्ज होने के बाद यह केस दिल्ली महिला पुलिस इकाई में गया और वहां की महिला पुलिस अधिकारी ने निशा को बुलाया, निशा ने जान को खतरा बता कर अपने पति से अलग रहने की बात कही, तो पति ने कहा कि वह इसके बिना नहीं रह सकता. आखिरकार सासससुर से अलग पास के ही दूसरे फ्लैट में रहने पर दोनों के बीच सहमति बनी और इस बात की भी सहमति बनी की बच्चे जैद को दादा-दादी के पास रोज एक घंटे के लिए सरताज ले जाया करेगा और खुद लाएगा.

 

यह सिलसिला 2013 जनवरी तक चलता रहा. जनवरी के आखिरी सप्ताह में एक दिन सरताज ने कहा कि वह अपनी मां के घर नहीं जा सकता, मां ही खुद लेने जैद को आएगी, निशा ने इस पर आपत्ति जताई तो उसे समझा बुझा लिया गया, फिर उसकी सास बच्चे को लेने आई और एक घंटे बाद वापस नहीं आई, तो उसने अपने पति को फोन किया तो उसने बताया कि बच्चा अभी तो चाचा के साथ दुकान पर आया था, यह सुनकर उसे हैरानी हुई और डर व शंका के बीच अपने बच्चे का इंतजार करने लगी.

 

दो-तीन घंटे बाद सरताज अपनी मां के साथ घर लौटा और उसने घबराते हुए पूछा क्या जैद घर आया? तो उसने कहा नहीं, तब मां और सरताज रोते हुए बोले कि आबिद बच्चे को लेकर गया और उसका भी पता नहीं और ना ही उससे कोई संपर्क हो रहा है. इस वक्त सरताज ने पत्नी का साथ देते हुए जगतपुरी थाने में इसकी शिकायत की.

एक सप्ताह तक बच्चे और आबिद का पता नहीं चला. फिर एक दिन निशा के पड़ोसी ने उसे बताया कि उन्होंने आबिद को एक पार्क में देखा है. आबिद को पार्क से गिरफ्तार किया गया. काफी पूछताछ के बाद उसने बताया कि उसने जैद को मार कर आनंद विहार के नाले में फेंक दिया है और इस घटना के बाद वह घर आया था, लेकिन मां ने पुलिस से पकड़े जाने के भय से उसे घर से फरार जाने को कहा था. पुलिस की टीम ने नाले में बच्चे की लाश ढूंढनी शुरू की, लेकिन नाले में बच्चे का शव न मिलने पर उसे मृत घोषित कर दिया गया.

मामला फिर महिला सेल में गया और जिसके बाद निशा पर हमला किए जाने का पुराना केस भी खुला, जिसमें आबिद को तीन साल कारावास की सजा सुनाई गई, इधर आबिद जहां तिहाड़ जेल में है, वहीं बच्चे की हत्या मामले कड़कड़डुमा कोर्ट में सुनवाई चल रही है, जिसमें सास-ससुर और पति सभी आबिद के खिलाफ दिए बयान से पलट गए हैं.

सरताज़ बच्चे की मौत के कुछ दिन बाद निशा के साथ रहा और फिर उस पर केस वापस लेने का दबाव बनाने लगा, लेकिन जब निशा नहीं मानी तो फिर इसका खामियाजा उसे पति से विरक्ति के रूप में चुकानी पड़ी.

निशा ने बच्चे की मौत के बाद गम भुलाने के लिए फिर से काम करना शुरू कर दिया. उसे अब न सिर्फ पति से तलाक का इंतजार है, बल्कि वह अपने 18 महीने के मासूम बच्चे की मौत के जिम्मेदार और इसमें शामिल सभी लोगों को जेल के अंदर देखना चाहती हैं.

निशा पर हालांकि, बार-बार केस वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन वह अपने इरादे पर अटल है. निशा को न सिर्फ अपने सास-ससुर और पति बल्कि व्यवस्था से भी शिकायत है. उसने उस निजी अस्पताल पर गलत मेडिकल सर्टिफिकेट बनाने का आरोप लगाया है, जिसने उसका इलाज किया था और साथ ही उस पुलिस अधिकारी पर घूस खाने का आरोप लगाया जिन्होंने उस पर दबाव डाल कर डरा कर गलत बयान देने को मजबूर किया था. वह यह लड़ाई इसलिए भी जारी रखना चाहती है ताकि फिर किसी निशा के साथ ऐसी घटना घटित न हो.

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