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सरकार-समाज-शिक्षा और नारी

शिक्षा एक ऐसा हथियार है, जिसके उपयोग से व्यक्ति के अंदर शक्ति का संचार होता है. शिक्षा, विकास का मार्ग प्रशस्त करता है. आत्मविश्वास उत्पन्न करता है, आत्मनिर्भर बनाता है, सही और गलत की पहचान करने योग्य बनाता और अन्याय के खिलाफ लड़ने की ताकत देता है. किसी भी समाज की मजबूती का सबसे बड़ा आधार शिक्षा है. जिस तरह जीवन को बचाये रखने के लिए हवा-पानी-भोजन जरूरी है, उसी तरह अपने आत्मसम्मान की रक्षा करने, उसे बचाए रखने के लिए शिक्षा जरूरी है, क्योंकि इसके अभाव में आत्मसम्मान की पहचान कर पाना ही मुश्किल हो जाता है.

हमारे देश में महिलाओं के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण शिक्षा का अभाव ही है. आज भी क्षिक्षा देने में लड़के और लड़कियों के बीच भेदभाव किए जाता हैं. एक तरफ लड़कों को आर्थिक निर्भरता प्राप्त करने के लिए शिक्षित किया जाता है, तो दूसरी तरफ लड़कियों को बस कामचलाऊ शिक्षा देने की बात सोची जाती है. यहां बात उन बीस प्रतिशत लोगों की नही की जा रही है, जो अपने बेटे और बेटी की शिक्षा पर समान दृष्टिकोण रखते हैं और दोनो को समान सुविधाएं प्रदान करते हैं, बल्कि यहां बात उन अस्सी प्रतिशत लोगों की हो रही है, जो अभी भी अपनी बेटी को कामचाऊ शिक्षा तक सीमित रखते हैं.

महिला शिक्षा के मामले में अभी भी हमारे देश की स्थिति दयनीय है. प्राथमिक शिक्षा के स्तर पर तो फिर भी सुधार और सुधार की संभावनाएं थोड़ा संतोष देती है, लेकिन उच्च शिक्षा की स्थिति आज भी बेचैन कर देने  वाली है. आज भी कॉलेज और विश्विद्यालयों में लड़कियों की संख्या काफी कम है और जो हैं, उसमें भी अधिकांश कुछ बड़े शहरों तक सीमित है. ग्रामीण क्षेत्र की स्थिति बदतर है.

ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में लड़कियों को कॉलेज तक पहुंचाना मुश्किल होता है. इसके दो कारण है. पहला कारण तो परिवार की वह सोच है, जिसके कारण यह समझा जाता है कि लड़कियों को ज्यादा पढ़ाकर क्या करना है. उसे तो शादी करके किसी दूसरे के घर जाना है. लड़कियों को केवल उतना पढ़ा दो, जितना पारिवारिक जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए आवश्यक है. इस सोच के कारण लड़कियों को स्कूल स्तर की शिक्षा तो दिलाई जाती है, लेकिन उच्च शिक्षा दिलाने में रूचि नही दिखाई जाती है.

उच्च शिक्षा तक लड़कियों की पहुंच कम होने का दूसरा कारण सरकार की उपेक्षापूर्ण नीतियां है. इसके लिए सरकार भी उतनी ही जिम्मेदार है, जितना कि समाज की मानसिकता. सरकार ने भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में लड़कियों के लिए द्वार बंद करने में कम भूमिका नही निभाई है. ग्रामीण क्षेत्रों में कॉलेज की संख्या काफी कम है. कालेज या तो जिला मुख्यालय में बनाए जाते हैं, या फिर उसके आस-पास के किसी क्षेत्र में. गांवों से कालेज जाने वाली लड़कियों की भौगोलिक दूरी इतनी होती है कि उसके घर वाले उन्हें कालेज तक जाने की अनुमति देने में कतराते हैं. एक तो कालेज की कमी और दूसरी बात कॉलेज तक जाने के लिए परिवहन साधनो का अभाव, ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करती है कि लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा, कॉलेज का माहौल मिलना दूभर हो जाता है.

वर्तमान स्थिति को बदलना है, तो सरकार की नीतियों और लोगों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा. सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार की है. सरकार या तो कॉलेजों की संख्या बढ़ाए, ग्रामीण क्षेत्रों में कॉलेज खुलवाए या फिर कॉलेज तक पहुंचने के लिए परिवहन के साधनो की व्यवस्था करे. अगर केवल शहरों को उच्च शिक्षा का केंद्र बनाया जाता रहा, तो ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों के लिए इसकी प्राप्ति का मार्ग बहुत कठिन हो जाएगा. वहां की लड़कियों को एक साथ दो तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. पहली समस्या सामाजिक मानसिकता के साथ संघर्ष करना, तो दूसरी समस्या कॉलेज की उपलब्धता का कम होना है, जिसके लिए उन्हें बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर जाना पड़ता है. इसलिए जरूरी है कि महिला सशक्तीकरण की बात करने वाली सरकार महिलाओं की शिक्षा के प्रति गंभीर हो, उन्हें संसाधन उपलब्ध कराए ताकि सही मायने में सशक्तीकरण हो सके, क्योंकि शिक्षा के बिना सशक्तीकरण तो संभव ही नही है.

अंत में यही कहना है कि सरकार जितनी जल्दी इस बात को समझ ले, उतना अच्छा होगा कि शिक्षा के बिना न तो महिलाओं का विकास संभव है और न ही उसके प्रति नजरिए में बदलाव. नारी को सशक्त और मजबूत बनाने का सबसे महत्वपूर्ण साधन शिक्षा है.

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