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काम के बिना मैं कुछ नहीं हूं: पूजा बंसल

i am nothing without work
महिला उद्यमी यानी यहां हम आपके सामने ला रहे हैं ऐसी महिलाएं जो किसी भी आम लड़की की तरह सामान्य परिवार में पढ़ी लिखी और कई सामाजिक व आर्थिक रुकावटों के बावजूद भी सफलता के मुकाम पर पहुंची। आज चाहे वो बढ़े उद्योगपतियों की सूची में हो न हो पर अपने क्षे़त्र और जीवन में उन्होंने अलग पहचान बनाई है। आईए जानें ऐसी ही एक महिला उद्यमी पूजा बंसल के बारे में :

‘मैं आज जो हूं अपने काम की वजह से हूं। मैं काम न करती तो यूजलेस (बेकार) हो जाती।‘ यह कहना है पूजा बंसल का। मारवाड़ी परिवार की एक सामान्य लड़की जिसका जीवन कुछ और होता अगर उसने अपने सपनों के लिए संघर्ष न किया होता और उनकी मां का साथ न मिलता। लेकिन मेहनत ने रंग दिखाया और पूजा बंसल आज एक इंटीरियर आर्किटेक्ट व कंसल्टेंट हैं और करीब 14 सालों से ‘डेनोटेशन डिजाइन‘ नाम से खुद की कंपनी चला रही हैं। लेकिन, उनके लिए यह सफर कुछ उतना ही मुश्किल था जितना एक सामान्य लड़की के लिए आगे बढ़ना होता है। पूजा एक ऐसी पृष्ठभूमि से आती हैं जहां लड़कियों की पढ़ाई का खास महत्व नहीं या पढ़ना तब तक ठीक है जब तक शादी नहीं हो जाती। नौकरी या बिजनस करना तो ख्यालों की बात भी नहीं।

अहमदाबाद में रहने के दौरान पूजा ने इन्हीं स्थितियों के बीच खुद को स्थापित करने का सपना देखा और बारहवीं करने के बाद इंटीरियर डिजाइन के क्षेत्र में जाने का निर्णय घर में बताया। स्वाभाविक है कि उनका विरोध हुआ लेकिन तब पूजा की मां के सहयोग से उन्होंने जानेमाने संस्थान ‘सेंटर फॉर इंवायरन्मेंट प्लानिंग एंड टेक्नोलॉजी यूनिवर्सिटी‘ (सेप्ट यूनिवर्सिटी) में इंटीरियर डिजाइनिंग के ग्रेजुएशन कोर्स में प्रवेश लिया। पूजा उस समय को याद करते हुए बताती हैं, ‘मेरे यहां लड़की का करियर बनाना कोई खास मायने नहीं रखता था। घरवाले चाहते थे कि बेसिक ग्रेजुएशन हो जाए और फिर शादी कर लूं। पर स्थितियां थोड़ा बहुत मेरे पक्ष में थी। मेरा इंस्टीट्यूट घर के पास ही था इसलिए घरवालों को भी लगा कि शौक-शौक में पढ़ लेगी और फिर शादी कर देंगे। इस तरह मेरे करियर की शुरूआत हुई।‘

कोर्स में एडमिशन के बाद भी पूजा की राह आसान नहीं हुई। वह बताती हैं, ‘मेरा संस्थान 24 घंटे खुला रहता था और वहां रात में भी प्रोजेक्ट्स पर काम चलता था। वह बड़ा कठिन वक्त था क्योंकि एक तो रात को कॉलेज जाने में घर से आपत्ति होती थी और दूसरा मुझे ये डर लगता था कि कहीं मैं सबसे पीछे न रह जाउं। उस समय भी मेरी मदद मां ने ही की, वो पापा को किसी तरह संभाल लेती थीं।‘ ग्रेजुएशन करने के बाद पूजा ने पार्ट टाइम काम करना शुरू किया। वो कहीं नौकरी करने के बजाए प्रोजेक्ट्स के आधार पर काम करती थीं ताकि घर पर समय से पहुंच जाएं। पूजा कहती हैं कि शुरूआत में उन्हें अपने दोस्तों की मदद से बहुत छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स मिले। जो भी प्रोजेक्ट मिला वो करती गईं और सिलसिला चलता रहा। साथ ही एक और चीज भी चलती रही, वो थी उनकी शादी की कोशिशें।

कुछ समय बाद पूजा को एक बिल्डर का सैंपल हाउस बनाने का बढ़ा प्रोजेक्ट मिला, जो उनके करियर में एक बड़ी उपलब्धि बना। ‘इस प्रोजेक्ट से बाहर ही नहीं बल्कि घर पर भी मेरे काम को पहचान मिली। जब बाहर के लोगों ने घर पर मेरे काम की तारीफ की तो घरवालों ने भी मुझे गंभीरता से लिया‘, गर्व महसूस करती हुईं पूजा आगे कहती हैं, ‘अभी तक घरवाले मेरे काम को शौकिया समझ रहे थे लेकिन अब लगा कि हमारी बेटी को लोग पैसे दे रहे हैं तो जरूर कुछ कर रही है। आज तो मेरे पापा मुझ पर बहुत गर्व करते हैं। जब भी फोन आता है तो मेरे पारीवार से पहले मेरा काम कैसा चल रहा है ये पूछते हैं।‘

ऊंचाइयां छूने के लिए कदम दर कदम आगे बढ़ रहीं पूजा के जीवन में फिर एक मोड़ आया और उनकी कंपनी की शुरूआत हुई। पूजा बताती हैं कि कंपनी योजनगत तरीके से नहीं बनी थी। एक सरकारी प्रोजेक्ट के लिए उन्हें कंपनी बनाने की जरूरत पड़ गई थी। तब साल 2000 में अहमदाबाद में रहने के दौरान उन्होंने कंपनी का निर्माण किया। उन्होंन बताया की हालांकि, वह प्रोजेक्ट तो उन्हें नहीं मिला लेकिन ये कंपनी जरूर चल पड़ी।

चुनौतियों का दौर यहीं नहीं खत्म हुआ। पूजा करीब छह साल पहले शादी के बाद दिल्ली आईं और यहां का माहौल बिल्कुल अलग पाया। वह कहती हैं कि शुरूआत में तो यहां फील्ड में खास जानपहचान ही नहीं थीं और वह बाजार को समझने की कोशिश कर रही थीं। फिर उन्हें एक दोस्त के जरिए एक प्रोजेक्ट मिला और काम की शुरूआत हुई। समय के साथ पूजा की दिल्ली में भी पहचान बनती गई और उनकी कंपनी सालभर में सात से आठ प्रोजेक्ट करने लगी।

लगातार मेहनत और छोटी-छोटी उपलब्धियां मिलाकर पूजा का करियर एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया, जहां आज वो खुद पर गर्व करती हैं। इस दौरान उन्हें छोटी-मोटी रुकावटों का भी सामना करना पड़ा जैसी की कभी कोई क्लाइंट उनके लड़की होने का गलत फायदा उठाना चाहता था। पूजा मानती हैं कि हर क्षेत्र में ये समस्याएं है पर इसे करियर के आड़े नहीं आने देना चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए। वो बताती हैं कि कई बार ऐसा भी होता है कि वो किसी प्रोजेक्ट की प्रेजेंटेशन में अकेली ही महिला होती हैं। पर तब वो अपने काम को पूरे आत्मविश्वास के साथ दूसरों के सामने प्रस्तुत करती हैं।

अपने काम से है बहुत प्यार

पूजा का कहना है कि वो अपने काम को केवल घर सजाने की नजर से नहीं बल्कि किसी का घर बसाने की तरह मानती हैं। लोगों की घर से भावनाएं जुड़ी होती हैं और वो उसे संवारने की जिम्मेदारी उन्हें देते हैं। एक क्लाईंट ने उनसे यहां तक कहा था कि पूजा यू मेड माय हाउस माय होम। वह बताती हैं कि उन्हें क्लाइंट्स से मिलने और काम के बारे में डिस्कस करने में बहुत मजा आता है। कई चुनौतियां भी मिलती हैं पर जब लोगों को अपने काम पर भरोसा दिला देती हैं तो वो अपने अनुसार काम करने के लिए पूजा को पूरी आजादी दे देते हैं।

बढ़ता चला सफर

एक इत्तफाक से शुरू हुई कंपनी को पूजा ने आगे बढ़ाया, जिसे आज करीब 14 साल हो गए हैं और पूजा 50 से ज्यादा प्रोजेक्ट्स कर चुकी हैं। उनकी कंपनी सालभर में करीब सात से आठ प्रोजेक्ट करती है। जहां सिलसिला छोटे-मोटे प्रोजेक्ट्स से शुरू हुआ था वहां अब पूजा की क्लाइंट लिस्ट में स्नैपडील और श्री राम ग्रुप जैसी कंपनियां भी शामिल हैं। इस समय वो स्नैप डील के अधिकारियों के लिए घर बनाने के प्रोजेक्ट पर काम कर रही हैं। पूजा इस समय फिक्की लेडीज ऑर्ग्रेनाइजेशन से भी जुड़ी हैं और सफल उद्यमियों में गिनी जाती हैं। साथ ही अपने बिजनस को यहीं तक सीमित न रखते हुए वह अपने दोस्तों के साथ एक और कंपनी बनाने की योजना भी बना रही है। जब पूजा से पूछा गया कि मां बनने का उनके काम पर कैसा प्रभाव पड़ेगा तो भी उनका कहना था कि काम धीमा हो सकता है पर रुकेगा नहीं।

काम से बनती है पहचान

अपने अनुभव बांटते हुए पूजा कहती हैं कि जब आप कमाती हैं तो आपमें एक सुरक्षा की भावना रहती है और आत्मनिर्भर महसूस करती हैं। बाहर निकलकर चार लोगों से मिलने-जुलने से आपकी जानकारी और सोचने की शक्ति भी बढ़ती है, जिससे आत्मविश्वास आता है। साथ ही समय हो या पैसा घरवालों से आप इनकी ज्यादा मांग करके आलोचना भी नहीं पातीं क्योंकि आपके पास भी काम होने से सीमित समय ही बचता है। अपनी पहचान भी बनती है।

‘जो हूं अपने काम से हूं‘

पूजा अपना जिंदगी काम के बिना सोच पाने के ख्याल से ही डर जाती हैं। जब उनसे यह सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मैं आज जो कुछ हूं अपने काम के कारण हूं। मेरे जीवन से काम निकाल दिया जाए तो मैं कुछ नहीं रहूंगी। अगर काम न करती तो साफतौर पर कहती हूं कि यूजलेस (बेकार) हो जाती और कहीं अपना योगदान नहीं दे पाती। वह कहती हैं, ‘आज मेरा और मेरे पति का अच्छा रिश्ता इस काम के कारण ही है। वरना जैसा है वैसा शायद न होता। हम घर में टीम की तरह काम करते हैं और बड़े फैसलों में बराबर भागीदारी निभाते हैं।‘

लड़कियों को करनी पड़ती है ज्यादा मेहनत

पूजा से पूछने पर की एक लड़की और लड़के के आगे बढ़ने में उनके सामने आनी वाली परिस्थितियों में क्या अंतर रहता है, तो उनका मानना है कि कई बार लोग शुरू में लड़कियों को गंभीरता से नहीं लेते हैं। उन्हें लोगों का भरोसा जीतने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। कहीं न कहीं इसका कारण यह है कि समाज में लड़कों को तो कमाने की भूमिका में स्वीकार कर लिया गया है लेकिन लड़कियों के लिए समय लगता है। अब भी बहुत कम महिलाएं हैं जो अपने घर में आर्थिक सहयोग कर रही हैं। अगर काम भी कर रही हैं तो मान्यता है कि घर मर्द के पैसों से ही चलता है औरत की कमाई तो अतिरिक्त है।

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