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कार्यस्थल पर होने वाले यौन उत्पीड़न के खिलाफ कानून को समझे यहां

ऑफिस में जाने वाली या घरों में काम करने वाली लड़कियों और महिलाओं पर अक्सर कार्य के दौरान अधिकारी की ओर से शारीरिक संबंध बनाने का दबाव डाला जाता है या अश्लील व्यवहार किया जाता है. उन्हें एसएमएस, फोन या दोहरे अर्थ की बातें कर मानसिक प्रताड़ना दी जाती है. अगर महिला उनके प्रस्ताव को ठुकरा देती है तो उसके काम में रुकावटें खड़ी कर परेशान किया जाता है.

उन्हें इस हद तक परेशान किया जाता है कि लड़कियों के नौकरी छोड़ने तक की नौबत आ जाती है और उनसे आगे बढ़ने के अवसर छिन जाते हैं. कई बार तो पीड़िता जान देने को भी मजबूर हो जाती है. इतना ही नही ऑफिस के ही सहकर्मचारी भी महिलाओं पर अभद्र टिपण्णी करके उसे प्रताड़ित करते हैं. कई बार उसकी पदोन्नति के लिए उसके शरीर को ही कारण बना दिया जाता है क्योंकि वो लड़की है इसलिए उसकी काबिलियत नजरअंदाज कर दी जाती है.

यौन उत्पीड़न की गंभीरता को देखते हुए महिलाओं को कानूनी सहयोग देने और उनके उत्पीड़न पर रोक लगाने के लिए कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न (निवारण निषेध एवं निदान) अधिनियम 2013 अस्तित्व में लाया गया है. इसके तहत कार्यस्थल पर लड़कियों और महिलाओं के साथ होने वाले उत्पीड़न के खिलाफ उन्हें अधिकार प्रदान किए गए हैं.इस कानून के बनने की नींव राजस्थान के भंवरी देवी कांड के बाद से पड़ी थी. वर्ष 1990 में राजस्थान सरकार के अंतर्गत काम कर रही भंवरी देवी का बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठाने के चलते बालात्कार कर दिया गया था. भंवरी देवी सरकार के महिला विकास कार्यक्रम के लिए काम करती थीं. व्यवस्था में लापरवाही के चलते आरोपियों को राजस्थान हाइकोर्ट में सजा नहीं हो पाई और उन्हें छोड़ दिया गया.

इसके बाद महिला अधिकारों के लिए कार्य करने वाले एक समूह विशाखा ने सर्वोच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की थी. इस याचिका में कोर्ट से आग्रह किया गया था कि कामकाजी महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को सुनिश्चित कराने के लिए कानूनी प्रावधान किए जाएं. इसके बाद वर्ष 1997 में विशाखा बनाम राजस्थान राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में विशाखा दिशा-निर्देशों को लागू किया था और इस फैसले में कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की बुनियादी परिभाषाएं दी थीं. इसके बाद यह दिशा-निर्देश साल 2013 में यौन उत्पीड़न के विरुद्ध कानून में तब्दील किए गए.

इस कानून के तहत संगठित और गैर संगठित दोनों ही क्षेत्र शामिल हैं. कार्यस्थल के अंतर्गत कोई भी सरकारी-निजी कंपनी, संस्थान, गैर-सरकारी संस्थान, ट्रस्ट सोसाईटी, अस्पताल, नर्सिंग होम, आवासीय या गैर-आवासीय खेल संस्थान, स्टेडियम, खेल कॉम्लेक्स, घर आदि आते हैं. कानून के संबंध में अन्य जानकारियां नीचे दी गई हैं: 

यौन उत्पीड़न क्या है-

विशाखा बनाम राजस्थान राज्य में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि महिला की इच्छा के विरुद्ध यौन भावना से संचालित किए गए व्यवहार को यौन उत्पीड़न माना जायेगा जैसे-

* यदि किसी महिला पर शारीरिक संपर्क के लिए दबाव डाला जाता है या फिर अन्य तरीकों से उस पर ऐसा करने के लिए दबाव बनाया जाता है.

*    किसी सहकर्मी, वरिष्ठ या किसी भी स्तर के कार्मिक द्वारा महिला से यौन संबंध बनाने के लिए अनुरोध किया जाता है या फिर उस पर ऐसा करने के लिए दबाव डाला जाता है.

*    किसी भी महिला की शारीरिक बनावट, उसके वस्त्रों आदि को लेकर भद्दी या अश्लील टिप्पणियां की जाती हैं.

*    कामोत्तेजक कार्य-व्यवहार या अश्लील और कामुक सामग्री का प्रदर्शन किया जाता है.

*    महिला की इच्छा के विरुद्ध यौन संबंधी कोई भी अन्य शारीरिक, मौखिक या अमौखिक आचरण किया जाता है.

*    यदि किसी महिला के अपने वरिष्ठ या सह कर्मचारी से किसी समय आंतरिक संबंध रहे हों लेकिन वर्तमान में महिला की सहमति न होने पर भी उस पर आंतरिक संबंध बनाने के लिए दबाव डालना. 

PHOTO: PRABHAT PANDEY

शिकायत निवारण प्रक्रिया-

अगर महिला कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराती है तो उसके समाधान के लिए निम्न व्यवस्था की जानी आवश्यक है:

*    कोई भी महिला ऐसी घटना होने के तीन महीनों के अंदर अपनी शिकायत कमिटी को लिख कर दे सकती है.

*    नियोक्ता द्वारा एक आंतरिक शिकायत कमिटी बनाई जाए.

*    महिलाओं के लिए एक विशेष परामर्शदाता हो.

*    शिकायत समिति की प्रमुख, कंपनी से जुड़ी एक महिला होनी चाहिए.

*    समिति में कम से कम आधी सदस्य महिलाएं ही होंगी.

*    एक सदस्य महिलाओं संबंधी मुद्दों पर काम करने वाली गैर-सरकारी संस्थाओं से या यौन प्रताड़ना से जुड़े मामलों का जानकार व्यक्ति होगा.

*    कमिटी के अध्यक्ष पर कोई आपराधिक मामला या अनुशासनात्मक कार्यवाही न चल रही हो.

*    अगर किसी प्रतिष्ठान में 10 से कम कर्मचारी होते हैं या नियोक्ता स्वयं आरोपी हो तो स्थानीय शिकायत समिति बनाई जाएगी. डिस्ट्रिक्ट ऑफिसर द्वारा इस कमिटी का गठन किया जाएगा.

*    स्थानीय शिकायत कमिटी की अध्यक्ष एक ऐसी महिला होनी चाहिए, जिसने सामाजिक कार्यों और महिला संबंधी मुद्दों पर काम किया हो.

*    कमिटी में एक अन्य महिला सदस्य ब्लॉक, तालुका, तहसील, वार्ड या नगर निगम में से किसी एक जगह पद पर कार्यरत होनी चाहिए.

*    कमिटी की जांच तीन महीनों के अंदर पूरी होनी अविार्य है.

*    जांच के दौरान शिकायत कमिटी से अनुरोध कर महिला ट्रांसफर ले सकती है, तीन महीनों की छुट्टी ले सकती है या कमिटी अन्य कोई सहायता कर सकती हैं. 

यौन उत्पीड़न के प्रभाव-

*    शारीरिक, भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक परेशानी

*    करियर में आगे बढ़ने के और नौकरी के अवसर का कम होना

*    ऑफिस में गैर हाजिरी

*    उत्पादकता घटना

*    आत्महत्या

*    पारिवारिक जीवन को नुकसान

*    नौकरी छूटना

नियोक्ता (Employer) की जिम्मेदारियां-

*    यौन उत्पीड़न को गंभीर अपराध के रुप में स्वीकार करें और नियमों को सख्ती से लागू करें.

*    कार्य स्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकें और दोषी को सजा दें.

*    इसके साथ ही यौन उत्पीड़न विरोधी जागरुकता प्रशिक्षण आयोजित करें.

*    सार्वजनिक और निजी कार्यस्थल में महिला कर्मचारियों को एक सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराए.

*    जब यह सुनिश्चित किया जा सके कि किसी भी कर्मचारी, अधिकारी का व्यवहार अपराध की श्रेणी में आता है तो नियोक्ता को उसके खिलाफ समुचित प्राधिकारी के सामने कानून के अंतर्गत शिकायत दर्ज करानी चाहिए और सजा मिलना सुनिश्चित करना चाहिए. साथ ही यह सुनिश्चित किया जाता है कि पीड़िताओं या गवाहों का शोषण न हो या उन्हें सुविधाहीनता की हालत में न रखा जाए.

*    अगर किसी कर्मचारी के खिलाफ कदाचार का मामला सामने आता है, तो सेवा नियमों के अनुसार उसके खिलाफ समुचित कार्रवाई हो.

यौन उत्पीड़न विरोधी नीति तैयार करें-

*    यौन उत्पीड़न की प्रकृति को पहचानें और स्पष्ट रूप से अपना पक्ष रखें.

*    बेझिझक उत्पीड़क से बात करें.

*    यौन उत्पीड़न के बारे में लोगों से बात करें.

*    यौन उत्पीड़न का एक विस्तृत घटनावार लेखा-जोखा रखें.

*    यौन उत्पीड़न की घटना का एक गवाह बनाने की कोशिश करें.

*    किसी महिला संस्था के पास जाएं.

*    बिना देरी किए औपचारिक शिकायत दर्ज कराएं.

*    अगर जरूरत हो तो परामर्श लें.

*    कार्यस्थल पर निरंतर जागरुकता कार्यक्रम और प्रशिक्षण कराए जाने की मांग करें. 

जरूरी है कि महिलाएं अपने साथ हो रहे अपराध का मजबूती से सामना करें और अधिकारों की जानकारी रखें. यौन उत्पीड़न जैसी समस्याओं को छुपाने से वो खत्म होने की बजाए बढ़ती हैं. आपके चुप रहने से एक तो आप खुद के साथ अन्याय करेंगी और दूसरा अन्य लड़कियों के साथ भी दुर्व्यवहार करने के लिए अपराधी की हिम्मत बढ़ाएंगी. साथ ही पीड़िता के घरवाले और सहकर्मचारी भी उसका साथ दें. महिलाओं को उत्पीड़ित करने की इस मानसिकात को इसके खिलाफ आवाज उठाकर ही रोका जा सकता है. महिलाओं के साथ कभी भी यौन उत्पीड़न होने की स्थिति में वो अपने ऑफिस और पुलिस में शिकायत अवश्य करें.

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