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झुग्गी में रहने वाली एक दलित महिला ऐसे बनी सफल उद्योगपति

कुछ फिल्मों की कहानियों को देखकर हम कहते हैं कि यह तो फिल्म है असल में ऐसा नहीं होता. परंतु कल्पना सरोज की कहानी किसी फिल्म की तरह अविश्वसनीय जरूर लगती है लेकिन उन्होंने इसे सच कर दिखाया है.

बाल विवाह का शिकार हुई एक दलित महिला जिसने समाज से तंग आकर आत्महत्या की कोशिश की हो, तंगी में एक बहन को खोया हो, वह आज एक करोड़ो की कंपनी की सीईओ हैं. यह एक काल्पनिक कहानी सी लगती है लेकिन इसे हकीकत बनाने के लिए ‘कमानी ट्यूब्स’ की मालिक कल्पना सरोज की हिम्मत और कई सालों की मेहनत लगी है. यह कहा जाता है कि संपन्नता के लिए पीढ़िया लग जाती हैं उसके बाद उनकी पुश्तें उसका उपयोग करती हैं. कल्पना सरोज ने अपने एक ही जीवन में और बिना किसी मजबूत नींव के सिर्फ अपने बूते सफलता की ईमारत खड़ी कर दी है. रंक से रानी बनने तक का यह सफर इतना आसान नहीं था. बाल विवाह जैसे दंश को झेलने और परिवार को संभालने के लिए बहुत साहस और ताकत की जरूरत थी.

कल्पना सरोज महाराष्ट्र में विदर्भ जिले की रहने वाली हैं. उनके पिता हवलदार थे और वह घर में सबसे बड़ी बेटी हैं. जब उनकी शादी हुई तब वह सबसे बड़ी तो थीं लेकिन उम्र में महज बारह साल थी. सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली लड़की जिसका अभी किताबों से रिश्ता बनना शुरू ही हुआ था उसे शादी के रिश्ते में बांध दिया गया. उनके पिता चाहतेे थे कि वह कम से कम दसवीं पास करें लेकिन बेटी को जल्द से जल्द शादी करके भेजने के बोझ ने उन्हें ऐसा करने नहीं दिया. कल्पना सरोज बताती हैं, ’जब मेरे लिए मुंबई से रिश्ता मिला तो मेरी मां बहुत खुश थीं. उन्हें लगता था कि मेरी बेटी भाग्यवान है जो शहर से रिश्ता आया है.’ इसलिए छोटी उम्र में ही 10 साल बड़े लड़के से उनकी शादी भी करा दी गई.

शहर की शादी की हकीकत कुछ ही समय में खुल गई. मुंबई में कल्पना सरोज का ससुराल विलासनगर में था. यहां एक झोपड़ी में उनके पति, सास-ससुर, जेठ-जेठानी और उनके बच्चे भी रहते थे. कल्पना के लिए यहां रहना बहुत मुश्किल हो रहा था. उनकी जेठानी घरों में काम पर जाती थीं और घर का सारा काम उन्हें ही करना पड़ता था. मुश्किल केवल इतनी ही नहीं थी.

Image Source: नारी उत्कर्ष

उस समय के बारे में कल्पना बताती हैं, ’घर का सारा काम करने के बावजूद भी मुझे पीटा जाता था. रोज की गाली-गलौच होती थी और जिंदगी नर्क बन गई थी.’ इस शादी से निकलना भी मुश्किल था क्योंकि हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार एक बार शादी हो जाए तो उसे कैसे भी निभाना होता है. इस बोझ तले वह जैसे तैसे जीवन बिता रही थीं. फिर उनके पिताजी मुंबई आए. उनसे अपनी बेटी की हालत देखी नहीं गई और वे उन्हें छह महीने बाद ही वापस घर ले गए. अपने पिता से उन्हें बहुत सहयोग मिला. वह खुद बताती हैं ’पिताजी ने गांव लाकर साफ-साफ कह दिया कि जो हुआ है उसे भूल जा. अब मैं तुझे खूब पढ़ाऊंगा.’

लेकिन, मुश्किलों का अंत अभी कहां होना था. लोग ससुराल छोड़कर आई लड़की को कहां जीने देते हैं. कल्पना सरोज को पास-पड़ोस से ताने मिलने लगे कि इसी ने कुछ किया होगा इसलिए ससुराल वालों ने निकाल दिया. वह स्कूल गईं तो वहां भी ताने पड़ने लगे. इस जली-कटी से तंग आकर कल्पना ने आत्महत्या का कदम उठा लिया. उन्होंने जहर पी लिया लेकिन किसी तरह उनकी जान बचा ली गई. इस पर भी लोगों की निष्ठुरता कम न हुई और कहने लगे कि मां-बाप का नाम खराब दिया इसलिए मरना चाहती थी. इस बात से कल्पना सरोज को बहुत झटका लगा. उन्हें लगा कि जिंदा रहो या मर जाओ लोग बोलना बंद नहीं करेंगे. इसलिए उन्होंने कहीं नौकरी करने का फैसला किया. उन्होंने पुलिस और नर्सिंग के क्षेत्र में कोशिश की लेकिन उसमें सफल नहीं हो पाईं. फिर उन्होंने टेलरिंग का काम सीख लिया और मुंबई वापस आ गईं. यहां वह चाॅल में रहकर अपने गुजारे लायक कमाने लगीं.

मुंबई में अपनी स्थिति से कल्पना सरोज संतुष्ट थीं लेकिन अभी एक और हादसा उनके साथ होना बाकी थी. उनकी बहन बहुत बीमार पड़ गई. पैसों की कमी के कारण उसका पूरी तरह ईलाज नहीं हो पाया और बहन मर गई. इस हादसे ने कल्पना सरोज को झकझोर दिया. वह कहती हैं, ’मैं बहुत ही निराश हो गई कि पैसों के कारण वह अपनी बहन को नहीं बचा पाईं. तब मैंने सोच लिया कि पैसा कमाना कितना जरूरी है. मैं नहीं चाहती थी कि मेरे किसी और भाई-बहन के साथ ऐसा कुछ हो.’ तब उन्होंने बैंक से 50 हजार रुपये लोन लेकर फर्नीचर का बिजनस शुरू किया. वह दिनरात काम में जुट गईं और अपनी पूरी ताकत लगा दी. उनकी मेहनत रंग भी लाई और काम चल पड़ा. धीरे-धीरे उन्होंने एक संस्था बनाई और दूसरों को भी जरूरत पर लोन दिलाना शुरू किया. इससे आसपास के लोगों में उनकी बहुत ईज्जत बन गई. इस दौरान कल्पना सरोज ने शादी भी कर ली. इसके बाद तो उनके कदम कभी पीछे हटे ही नहीं और वह तेजी से आगे बढ़ती चली गईं.

उन्हें पहले सस्ते दामों में एक प्लॉट मिला जिसकी कीमत बाद में बढ़ गई. इसी सिलसिले में वह एक व्यक्ति के साथ कंस्ट्रक्शन लाइन में आ गईं. इसमें उनकी कई लोगों से मुलाकात हुई और संपर्क भी बड़े. इसी दौरान उनकी मुलाकात ’कमानी ट्यूब्स’ कंपनी के लोगों से हुई. इस कंपनी के कर्मचारियों का मामला सर्वोच्च न्यायालय में लंबित था और कंपनी उस वक्त नुकसान में थी. वह कहती हैं, ’मैं वहां काम करने वालों को न्याय दिलाना चाहती थी. मुझे किसी भी तरह कंपनी बचानी थी और उनकी रोजी रोटी भी.’ तब उन्होंने कंपनी का कार्यभार संभाला, दस लोंगों की एक टीम बनाई और कंपनी में फिर से जान फूंक दी. आज ‘कमानी ट्यूब्स’ करोड़ों की कंपनी है और अपने क्षेत्र में एक जानामाना नाम रखती है. वह साल 2006 में कंपनी की मालिक बन गईं.

पद्म श्री से नवाजी गईं

कल्पना सरोज ने कभी अपने पुराने और डरवाने दिनों को पीछे मुड़कर नहीं देखा. आगे बढ़़ने के लिए उन्होंने अपने रास्ते बनाए और जुट गईं पूरी मेहनत से मंजिल तक पहुंचने के लिए. उन्होंने अपने भाई-बहनों और बच्चों को भी काबिल बनाया. उनका बेटा पायलट है और बेटी विदेश में होटल मैनेजमेंट कर रही है. वह अपने गांव के लोगों की भी काफी मदद करती हैं. कल्पना सरोज को भारत सरकारी की ओर से व्यापार एवं उद्योग के लिए साल 2013 में पदम श्री से भी नवाजा जा चुका है. उन्हें थाइलैंड सरकार की ओर से भी अपनी उपलब्धियों के लिए पुरस्कार दिया गया है. इसके अलावा वह राज्य स्तर पर भी कई अवाॅर्ड पा चुकी हैं.

Image Source: नारी उत्कर्ष

बुरे अनुभवों से भी मिली सीख

किसी काम को करने में अच्छे और बुरे लोगों का मिलना स्वाभाविक है. परंतु बुरे अनुभवों को कोई कैसे लेता है यह उस व्यक्ति पर निर्भर करता है. कल्पना सरोज का मानना है कि उनहोंने अपने बुरे अनुभवों से भी सीख ली है. औरत और दलित होने की वजह से कई परेशानियां सामने आईं. गांव में रहने के दौरान छुआछूत का भी सामना करना पड़ता था. मुंबई में काम करते हुए उन्हें जान से मारने की कोशिश भी की गई लेकिन पुलिस से उन्हें बहुत मदद मिली. दिक्कतों के बावजूद भी वह बिना रुके काम में लगी रहीं और आज इस मुकाम पर हैं.

हिम्मत बहुत जरूरी है

अगर किसी महिला को पढ़ने का मौका नहीं मिल पाया तो उन्हें भी हिम्मत नहीं हारनी चाहिए. सरकार की तरफ से भी महिलाओं को अपना काम करने के लिए काफी सुविधाएं दी गई हैं. कल्पना सरोज को उस वक्त ऐसी किसी सुविधा की जानकारी ही नहीं थी. शिक्षित न होने के चलते उन्हें बिजनस संबंधी काननू और वित्तीय मामलों में दिक्कतें भी आईं. इस पर कल्पना सरोज कहती हैं, ’मुझे बिजनस से जुड़ी चीजों की बहुत अधिक जानकारी नहीं थी. यह सही भी है कि पढ़ा-लिखा व्यक्ति चीजों को जल्दी समझ लेता है. लेकिन मैंने मदद के लिए कंसल्टेंट रख लिए. मैं बहुत ध्यान से हर चीज को समझने की पूरी कोशिश करती थी.’ इस तरह उनका अनुभव बढ़ता गया और आज वह महसूस करती हैं जैसे कि वो खुद एक सीए या वकील बन गई हैं.

जरूरत है घर से बाहर निकलने की

कल्पना सरोज का मानना है कि महिलाओं में ऐसी कोई कमी नहीं कि वह अपना बिजनस नहीं कर सकती. बस जरूरत है तो घर से बाहर कदम निकालने की. अगर यह मानकर बैठ गए कि हम क्या कर सकते हैं, पति कमा ही रहा है, तब तो फिर कुछ नहीं कर पाएंगे. कुछ करने की इच्छा तो पहले जगानी होगी. फिर औरत की कमाई उसके भविष्य और परिवार के काम आती है. उनका जीवनस्तर अच्छा हो जाएगा. अपने बच्चों को अच्छा पढ़ा-लिखा सकेंगी. आज के समय में औरतें बहुत कुछ कर रही हैं हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए.

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