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सुप्रीम कोर्ट में एक भी महिला नहीं बनी मुख्य न्यायाधीश, कौन जिम्मेदार?

न्यायालयों में आंख पर पट्टी बांधे न्याय की देवी की मूर्ति होती है. उनके हाथ में एक तराजू होता है, जिसके दोनों पलड़े समान होते हैं लेकिन इस मूर्ति के पास रखे न्याय के सिंहासन पर बैठने वाले न्यायाधीशों की संख्या की ओर एक नजर डालें, तो यहां असमानता का जो नजारा देखने को मिलता है, वह स्तब्ध कर देने वाला है. सुप्रीम कोर्ट हो या हाई कोर्ट हर न्यायालयों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है. न्यायपालिका में महिलाओं की संख्या अपने आप में सब कुछ बयां करती है. उच्च स्तरीय न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर आधारित है, नारी उत्कर्ष की यह रिपोर्ट:

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था विश्वास पर आधारित होता है. लोक का तंत्र के ऊपर विश्वास ही लोकतंत्र का आधार होता है, लेकिन अगर किसी वर्ग को शासन के विभिन्न क्षेत्रो में सम्मानजनक प्रतिनिधित्व नही दिया जाए, तो क्या उसका विश्वास उस तंत्र पर होगा और ऐसी स्थिति में क्या वह व्यवस्था लोकतंत्र कहलाने के लायक है.

भारत में कहने को तो लोकतंत्र है. चुनाव के द्वारा सरकारें चुनी जाती है. सभी व्यस्क पुरूषों तथा स्त्रियों को वोट देने का अधिकार है. शासन में परोक्ष तौर पर भागीदारी का अधिकार है लेकिन जब बात प्रतिनिधित्व की हो, तो वोट देने के अलावा शासन के अन्य सभी क्षेत्रों में महिलाओं का  प्रतिनिधित्व उनकी जनसंख्या के अनुपात से काफी कम नजर आता है. जिस तरफ वे नजर उठाकर देखतीं हैं, वहीं उन्हें पुरुषों की भीड़ में इक्का-दुक्का महिलाएं दिखाई देती है. चाहे राजनीति हो या सरकारी नौकरी, निजी क्षेत्र में काम करने वाले लोग हों या फिर उद्योग-व्यापार करने वाले, हर क्षेत्र में उन्हें अपने वर्ग के प्रतिनिधित्व में असमानता का नजारा देखने को मिलता है.

न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है. वहां से बड़े-बड़े फैसले लिखे जाते हैं, लेकिन फैसला लिखने वालों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व न के बराबर ही है. सुप्रीम कोर्ट हो या फिर हाई कोर्ट, जहां भी देखें हर जगह संख्या के हिसाब से पुरुष न्यायधीशों का पलड़ा भारी नजर आता है. न्यायाधीशों की सूची में महिलाओं का नाम बहुत ढूंढने पर मिलता है. सबसे पहले न्याय की अंतिम सीढ़ी यानी सुप्रीम कोर्ट में महिला न्यायाधीशों की संख्या पर नजर डालते हैं.

सुप्रीम कोर्ट में एक न्यायाधीश 

सुप्रीम कोर्ट में 31 न्यायाधीशों का प्रावधान है, लेकिन वर्तमान समय में 25 न्यायाधीश कार्यरत हैं, यानी 6 न्यायाधीशों की जगह खाली है. इन 25 न्यायाधीशों में  केवल एक महिला न्यायाधीश हैं और वो हैं न्यायाधीश आर. भानुमति.  इस तरह महिलाओं का प्रतिनिधित्व सिर्फ 4 प्रतिशत है जबकि परुषों का 96 प्रतिशत. सर्वोच्च न्यायालय में आधी आबादी के प्रतिनिधित्व का अभाव दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है.

इससे भी खराब स्थिति मुख्य न्यायाधीश के संदर्भ में देखने को मिलती है. भारत की आजादी के बाद सुप्रीम कोर्ट में 45 मुख्य न्यायाधीश हो चुके हैं, लेकिन उनमें एक भी महिला नही हैं. यानी पिछले 67 सालों में एक भी महिला मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी तक नही पहुंच पाईं है. सुप्रीम कोर्ट के बेवसाईट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 1947 से अभी तक केवल 5 महिला न्यायाधीश हुई हैं, यानी अभी तक न्यायाधीश के तौर पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व केवल 3.24 प्रतिशत ही रहा है. पच्चास प्रतिशत आबादी का देश के सर्वोच्च न्यायालय में सिर्फ साढ़े तीन प्रतिशत प्रतिनिधित्व सामाजिक उपेक्षा को दिखाता है कि किस तरह महिलाओं को देश की पुरुषवादी व्यवस्था ने आगे बढ़ने से रोका है.

सुप्रीम कोर्ट की तरह ही महिला प्रतिनिधित्व के संदर्भ में देश के 24 हाई कोर्ट की स्थिति भी कमोबेश एक तरह की ही है. यहां तो स्थिति सुप्रीम कोर्ट से भी बदतर रही है. देश के कुछ उच्च न्यायालयों में तो एक भी महिला न्यायाधीश नही है. अब सवाल यह उठता है कि न्यायपालिका में महिलाओं के प्रतिनिधित्व कम होने का कारण क्या है. आखिरकार इस देश की उच्च स्तरीय न्यायापालिका में महिलाओं का प्रतिनिधित्व पांच से दस प्रतिशत के बीच ही क्यों है और कई जगहों पर तो उनका प्रतिनिधित्व है ही नही.

महिलाओं की इस कम संख्या के बारे में दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री और वरिष्ठ अधिवक्ता सोमनाथ भारती का कहना है कि समाज में महिलाओं के प्रति नजरिया इसके लिए बहुत हद तक जिम्मेदार है. महिलाओं को वस्तु के तौर पर देखा जाता है और उनके प्रति लोगों की सोच भी बहुत धीरे-धीरे बदल रही है. उन्होंने कहा कि जिस तरह की घटनाएं सामने आती है, जैसे अभिषेक मनु सिंघवी का सेक्स स्कैंडल,जिसमे जज बनाने के लिए एक लड़की के शरीर का इस्तेमाल करने की बात आई थी, वह भी इसके लिए कम जिम्मेदार नही है. उनका कहना है कि अगर महिलाओं का प्रतिधित्व बढ़ाना है, तो इसके लिए पूरी व्यवस्था काे युद्ध स्तर पर काम करना पड़ेगा. लोगों की सोच बदलने के लिए अभियान चलाना होगा और साथ ही उन्हें बेहतर सुविधाएं उपलब्ध करानी होगी, जिससे उनके अंदर इस पुरुषवादी समाज में आगे बढ़ने के लिए डर का माहौल न रहे, महिलाओं को भी लगे कि उन्हें सफलता केवल उनकी प्रतिभा के आधार पर मिलेगी, न कि शरीर के इस्तेमाल से.

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में महिलाओं का प्रतिनिधित्व काफी कम है. इसके लिए जिम्मेदार न्यायपालिका तो नहीं है, क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति की एक प्रक्रिया होती है और अगर उस प्रक्रिया में महिलाएं कम आ रही हैं, तो उच्च स्तरीय न्यायापालिका इसके लिए कुछ नहीं कर सकती है, लेकिन सरकार को तो इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी. न्यायिक व्यवस्था में किसी समुदाय का प्रतिनिधित्व इतना कम और उसमें भी उस वर्ग का जिसके साथ सबसे ज्यादा अन्याय होता है, जिन्हें सबसे ज्यादा पीड़ित किया जाता है, एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है.

अगर इस पुरूषवादी सामाजिक सोच ने महिलाओं को आगे नहीं बढ़ने दिया है या दे रहा है, तो इसके लिए सरकार को कुछ विशेष व्यवस्था तो करनी ही चाहिए. न्यायपालिका में महिलाओं को आरक्षण दिया जाए या नहीं यह एक अलग मुद्दा है और इसके ऊपर अलग से चर्चा होगी, लेकिन आरक्षण ही एक मात्र विकल्प भी नहीं होता है. महिला एक ऐसा वर्ग है, जिसके साथ आर्थिक स्थितियों के कारण केवल अन्याय नहीं होता है, बल्कि  मानसिकता के कारण अन्याय होता है.

महिला हर घर में है और इसके कारण हर आर्थिक तबके की महिलाएं होती हैं, लेकिन इसके बावजूद अगर उनका प्रतिनिधित्व इतना कम है, तो इसका कारण उनके प्रति समाज का नजरिया है, जिसने महिलाओं को आगे बढ़ने से रोका है. सरकार की जिम्मेदारी इसी सामाजिक नजरिए को बदलने, महिलाओं को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करने और हर क्षेत्र में उनका एक सम्मानजनक प्रतिनिधित्व देने के लिए कोशिश करने की है.

सामाजिक भेदभाव जिम्मेदार

उच्च एवं सर्वोच्च न्यायपालिका में महिला न्यायाधीशों के कम प्रतिनिधित्व के बारे में अधिवक्ता किरण उप्पल का कहना है कि चूंकि उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश बनाए जाने के दो तरीके होते हैं,जिसमें पहला तरीका होता है, नीचे की अदालतों से पदोन्नति करके ऊपर के अदालतों तक पहुंचना और दूसरा तरीका है वकील को न्यायाधीश बनाया जाना, जिसके लिए कुछ नियम बनाए गए हैं. हालांकि, दोनों ही तरीकों में लिंग के आधार पर विभेद नहीं किया जाता है, लेकिन जहां तक वकील से जज बनने का प्रश्न है, तो उसमें महिलाओं की संख्या काफी कम होती है, जिसका कारण विभेद नहीं, बल्कि महिला वकीलों की कमी को माना जाना चाहिए. आश्चर्य की बात है कि दिल्ली हाई कोर्ट में अभी भी पुरुष वकीलों की तुलना में महिला वकीलों की संख्या काफी कम है, जबकि यहां सबसे ज्यादा महिला वकील हैं. किरण उप्पल कहती हैं कि न्यायपालिका में महिलाओं के साथ कोई भेदभाव तो नहीं है, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि यहां महिलाओं की संख्या काफी कम है.

किरण उप्पल ने न्यायपालिका में महिलाओं के कम प्रतिनिधित्व की बात तो की लेकिन उन्होंने इसके लिए न्यायपालिका में विभेद की बात नहीं की और यह सच भी है, क्योंकि इसके लिए न्यायपालिका नहीं, बल्कि समाज और सरकार की नीतियां जिम्मेदार है, जिसके कारण अभी तक इस क्षेत्र में महिलाओं का प्रतिनिधित्व इतना कम रहा है.

हालांकि, समाज के कुछ लोगों का कहना है कि महिलाएं खुद ही न्यायपालिका में कम आना चाहती हैं. एक महिला वकील ने भी कहा कि जब वह कानून की पढ़ाई कर रही थीं, तो उनकी क्लास में लड़कियों की संख्या बहुत कम थी और जिन लड़कियों ने डिग्री ली, उसमे भी अधिकांश ने प्रैक्टिस शुरू नहीं की. हालांकि, वर्तमान स्थिति को देखें, तो उनकी बात सही है, क्योंकि अगर ज्यादा लड़कियां कानून की पढ़ाई करतीं, प्रैक्टिस करतीं या फिर न्यायाधीश बनने के लिए परीक्षा देतीं, तो स्थितियां बदली हुई होतीं और न्यायपालिका में भी महिला प्रतिनिधित्व इतना कम नहीं होता.

लेकिन, वर्तमान स्थिति की बात करने से पहले हमे भूतकाल के बारे में सोचना होगा, नहीं तो समस्या की जड़ तक पहुंचा ही नहीं जा सकता है. अगर इसी तरह की बात दूसरे वर्गों के लिए की जाती होती, तो सरकार को वर्ग विशेष के लिए योजना चलाने, उन्हें आरक्षण देने की जरूरत ही नहीं महसूस होती. महिलाओं के साथ भी कुछ ऐसी ही स्थिति है. उन्हें हजारों वर्षों से दबाकर रखा गया है, उनके साथ भेद भाव किया जाता रहा है, तो स्थितियां उनके अनुकूल कैसे हो सकती हैं. इस भेदभाव के चलते बनी परिस्थितियों के कारण वो आगे नहीं बढ़ पातीं और करियर बदलना पड़ता है या बीच में ही छोड़ना पड़ता है.

अगर न्यायापालिका में महिलाएं कम आ रही हैं, तो सरकार को इसके ऊपर विचार करना चाहिए. उनकी प्रतिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए कमिटी बनानी चाहिए, इसके ऊपर चर्चा करनी चाहिए और फिर एक रणनीति बनानी चाहिए, जिसके ऊपर अमल करके महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाया जा सके, क्योंकि अगर 50 प्रतिशत जनसंख्या वाले किसी वर्ग का न्यायपालिका जैसे संवेदनशील क्षेत्र में चार-पांच प्रतिशत प्रतिनिधित्व होता है, तो यह लोकतंत्र के लिए शर्म की बात है. कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था वितरण मूलक न्याय यानी शासन-प्रशासन के हर क्षेत्र में सभी वर्गों की भागीदारी में न्याय के बिना सच्चा लोकतंत्र कहलाने के लायक नही हैं. अगर भारत में सच्चा लोकतंत्र स्थापित करना है, तो महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के बारे में गंभीर होना होगा.

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