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वो गरीब तो है पर बेचारी नहीं…

‘बेचारी औरत, पति ने छोड़ दिया, अकेली है और बच्चा भी है, क्या करेगी. मर्द तो मर्द होता है, घर में एक मर्द का होना जरूरी है.’ ऐसी बातें अक्सर सुनने को मिल जाती हैं। लेकिन, सुशीला (बदला हुआ नाम) जैसी महिलाएं इन बातों को गलत साबित करते हुए अकेले अपने बल पर जी रही हैं. वह अपने बच्चे की जिम्मेदारी खुद उठा रही है और जीवनयापन के लिए किसी पर निर्भर नहीं है.

सुशीला एक रिक्शा चालक है और पति से अलग होने के बाद अब खुद अपने बच्चे का पालन कर रही है. उसे मैंने नोएडा में देेखा था. मैं नोएडा से लौट रही थी और किसी रिक्शे की तलाश में थी. दिवाली के आसपास का समय था और मुझे निकलते हुए भी थोड़ी देर हो गई थी. मुझे रास्ते में कोई रिक्शा या ई-रिक्शा नहीं दिख रहा था. मैं आॅटो लेने की सोच ही रही थी कि दूर से मुझे एक रिक्शा आता हुआ दिखाई दिया पर उस रिक्शे पर कोई बैठा था. लेकिन, उस रिक्शा चलाने वाली ने मुझसे पूछा कि कहां जाना है. मैं तब तक स्थिति समझ ही रही थी कि मैंने देखा कि वो रिक्शा एक औरत चला रही है और वो बैठने वाली कोई सवारी नहीं बल्कि एक बहुत छोटा बच्चा है.

अचानक उस रूट पर एक औरत को रिक्शा चलाते देख मुझे थोड़ी हैरानी हुई क्योंकि पहले कभी वहां या कहें किसी औरत को मैंने रिक्शा चलाते नहीं देखा था. फिर मैं उसके रिक्शे पर बैठी और उसके बारे में बातें करने लगी. सुशीला उत्तर प्रदेश की ही रहने वाली है. उसके मौसा-मौसी ने ही उसे पाला है और वे दोनों दिल्ली में रहते हैं. सुशीला ने उन्हें बिना बताए यहां नोएडा में शादी कर ली थी और उसका एक बेटा भी हुआ. परंतु, किन्हीं कारणों से पति-पत्नी अलग हो गए और पति ने बच्चे की जिम्मेदारी उठाने से मना कर दिया. तब सुशीला ने अकेले अपने बच्चे की जिम्मेदारी उठाने की ठानी. उसने भीख मांगने या कोई गलत रास्ता चुनने की बजाए मेहनत की कमाई करने का सम्मानजनक रास्ता निकाला.

अब सुशीला नोएडा सेक्टर 63 में रिक्शा चलाती है. वह अपने दो साल के बच्चे पीयूष को भी रिक्शे पर साथ लेकर चलती है और गिरने से बचाने के लिए उसे रिक्शे पर चुन्नी से बांध देती है. बच्चा सवारी के साथ बैठकर ईधर से उधर जाता रहता है. दो साल का मासूम सवारियों के साथ घुलमिल भी जाता है. सुशीला किसी भी अन्य रिक्शा चालक की तरह रोज घंटों सड़क पर खड़ी रहती है और रात 11 बजे तक रिक्शा चलाती है. उस जगह दुकान लगाने वाले कुछ लोग भी उसका हौसला बढ़ाते हैं. हालांकि, निजी कारणों से वह अपने बारे में ज्यादा कुछ बताने से बचती है. सुशीला अपनी शादी को भी भुला देना चाहती हैं और अपने पति से कोई उम्मीद नहीं रखती. वह कहती है, ’जब एक पिता बच्चों को अकेले पाल सकता है तो मां क्यों नहीं. जब वह अपने बच्चे के लिए दूध भी नहीं खरीदना चाहता तो मैं क्यों उससे पैसे मांगू.’

Image Source: नारी उत्कर्ष

महिलाओं के  लिए मिसाल
आज जहां कई औरतें आर्थिक कमजोरी के चलते शादी टूटने से डरती हैं, उसका ना कमाना उसे अनचाहे रिश्ते में रहने को भी मजबूर करता है वहीं, सुशीला ऐसी महिलाओं के लिए एक मिसाल है. उसका रिक्शा चलाना दो तरह से खास महत्व रखता है. पहला यह है कि एक साधारण महिला, जो अभी तक केवल पति पर निर्भर थी. वह बहुत पढ़ी-लिखी नहीं है और न कोई हुनर जानती है, फिर भी उसने रास्ता खोज लिया. उसने न केवल अपने दम पर बच्चे के पालन-पोषण का जिम्मा उठाया बल्कि ऐसे काम में कदम रखा जिसमें महिलाएं न के बराबर दिखती हैं. शुरूआत में पुरुषों के बीच रिक्शा चलाना सुशीला को भी अटपटा लगा था लेकिन धीरे-धीरे उसने अपनी इस झिझक को खत्म कर दिया.

दूसरा यह कि रिक्शा चलाना शारीरिक ताकत वाला काम है. हमारे समाज ने महिलाओं को हमेशा कमजोर माना है. यह बात महिलाओं के जहन में भी इस तरह समाई है कि वे खुद को कमजोर मानती हैं. लेकिन, सुशीला ने रिक्शा चलाकर कमजोरियत के भ्रम को भी तोड़ दिया है. वह अन्य रिक्शा चालकों की तरह ही एक या दो सवारी लेकर जाती है.

लेकिन, सुशीला इससे बहुत कम कमा पाती है. एक तो उसका रिक्शा किराए पर है और दूसरा उस रूट पर ई-रिक्शा भी काफी चलते हैं और रिक्शे वालों की कमाई बहुत कम होती है. सुशीला ने ई-रिक्शा के लिए भी कोशिश की थी लेकिन उसे नहीं मिला. फिर भी वह अपने बच्चे को पढ़ा-लिखाकर एक अच्छी जिंदगी देना चाहती है. सुशीला उदाहरण है औरत की सक्षमता का. साथ ही इसका भी कि कोई काम स्त्री या पुरुष में बंटा नहीं होता. इसलिए किसी भी काम से घबराना नहीं चाहिए.

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