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वीरांगना झलकारी बाई

कुछ लोगों को उसके योगदान से अधिक मिल जाता है, तो कुछ  को बहुत कम. बात जब महिलाओं की हो, तो हमें  कुछ गिने-चुने नाम हीं याद रहते हैं, जिन्होंने इतिहास के पन्नों पर अपना नाम प्रमुखता से दर्ज कराया है. नारी उत्कर्ष उन महिलाओं यानी महास्त्रियों से आपका परिचय कराने की कोशिश करेगा,जिनके योगदान को यथोचित स्थान नहीं मिल पाया है. महास्त्री की इसी कड़ी में पेश है, एक वीर, साहसी, त्यागमूर्ति महास्त्री झलकारी बाई की जीवन और उसके योगदान से जुड़ी कुछ घटनाएं….

झांसी में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था. समय के क्रूर व भयावह मजाक ने सबको स्तब्ध कर दिया था. अभी कुछ दिन पहले ही झांसी के राजा गंगाधर राव की मृत्यु हुई थी. ऐसा नहीं था कि गंगाधर राव बड़े प्रजापालक व दयालु राजा थे. गंगाधर राव भी तत्कालीन राजाओं व सामंतो की ही भांति थे, किंतु भारतीय समाज में शोषक व शोषित का संबंध भी पिता-पुत्र की ही तरह स्थापित हो जाता है. अतः प्रजा स्वयं को अनाथ सा महसूस कर रही थी. गंगाधर राव की विधवा जिसे इतिहास झांसी की रानी के नाम से जानता है, अभी उसकी उम्र ही क्या थीँ? अभी बचपना पूरी तरह गुजरा ही नहीं था कि पति की मृत्यु ने उसे बुजुर्गेों की तरह गंभीर और शांत कर दिया था. किन्तु अभी विपदाएं टली कहां थीं, अभी तो अंग्रेज बहादुर का फरमान आना बाकी था और वो आया भी. इस समय ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी था तथा उसकी हड़प नीति भावनाओं से नहीं बल्कि इस्पात की तरह के सख्त इरादों से बनी थी. गंगाधर राव के कोई वैध पुत्र न था, किन्तु मृत्यु से पहले दामोदर राव नामक बालक को गोद ले लिया गया था. उम्मीद थी कि दामोदर राव को ही उत्तराधिकारी मान लिया जायेगा पर लाट साहब ने ऐसा मानने से इनकार कर दिया और झांसी को ब्रिटिश राज्य में मिलाकर झांसी की रानी को पेंशन भोगी बनने पर मजबूर करने का इरादा कर लिया था.

अंग्रेजों की इसी नीति ने इतिहास को एक एसी विरांगना से परिचय कराया, जिसके नस-नस में देशभक्ति की भावना रूपी लहू बह रहा था. झांसी में ही कोरी जाति के टोले की एक झोपड़ी में एक अलग ही दुनिया थी. पूरन कोरी की पत्नी बनकर अभी कुछ समय पहले ही झलकारी झांसी आई थी. झांसी से कुछ कोस दूर भोजला गांव में उसका जन्म हुआ था. इतिहास में जिसे सूर्य की तरह चमकना होता है उसकी टिमटिमाहट तो बचपन से ही दिखाई पड़ने लगती है. झलकारी भी इसका अपवाद नहीं थी. औसत कद, सांवला रंग, दर्प और विनम्रता से मिश्रित आंखों की चमक उसके चेहरे पर हमेशा से ही थी, जो वक्त के साथ बढ़ती ही गई. झलकारी में एक अदभुत साहस की प्रवृत्ति थी. बचपन से ही वह मिट्टी से किले बनाती और कल्पना करती कि एक दिन अम्मा बाबू के साथ किले में ही रहेगी. बचपन में सामाजिक कुरीतियों की जानकारी कहां होती है, यही कारण है कि शायद वह  भूल जाती थी कि समाज उसे नीची जाति का मानता है. किला क्या, चैन से रहने भी दे तो गनीमत है. झलकारी ने नौ वर्ष की अवस्था में बाघ का शिकार भी किया था. भय तो जैसे उसे छू ही नहीं गया था. मन से पवित्र थी अतः मुंहफट भी थी. लोग कहते थे कि उसकी कदकाठी व शक्लो-सूरत झांसी रानी से मिलती-जुलती है. आह! नियति की यह कैसी विडंबना, शक्ल-सूरत का यह मेल इतिहास को किस ओर ले जाएगा यह सोच पाना भी उस वक्त असंभव सा लगता था.

अंग्रेजों की भारत पर विजय उनके सैन्य बल की विजय की कहानी नहीं थी. वरन् यह भारत के उस समाज की पराजय थी जो रूढ़ियों में जकड़ा हुआ था, जहां व्यक्ति की योग्यता नहीं जाति और लिंग से जुड़ी मान्यताएं समाज में उसके स्थान को निर्धारित करती थी. ऊंची और नीची जातियों  में विभाजित यह समाज भला एकता के सूत्र में बंधे अंग्रेजी समाज का सामना कैसे कर पाता. ऊंची जातियां, जमींदार, साहूकार आदि नीची जातियों का यथासंभव शोषण करते. झलकारी की विडंबना थी कि वह नीची जाति की तो थी ही उस पर भी महिला थी. पुरूष स्त्री को अंकशायनी बनाकर उसके नाज नखरे उठा सकता है, काम के वशीभूत हो, उसके कदमों पर लोट सकता है, पर जब अधिकार देने की बात आती है, तो वह उसे स्त्रियोचित व्यवहार की नसीहतें देने लगता है. सदैव से ही पुरूष नारी को सोलह श्रंगार में ढकी हुई वस्तु के रूप में ही रखना चाहता रहा है.  ऊंची जाति की महिलाओं को जौहर का प्रशिक्षण दिया जाता था किंतु यदि वे तलवार लेकर युद्ध भूमि में आयें तो पुरूषों के दम्भ और पुरुषत्व को चोट पहुंचती थी. स्त्री से उम्मीद की जाती थी कि वह आत्मरक्षा हेतु आत्मदाह करें अस्त्र-शस्त्र अभी न उठाएं और महिलाएं सदियों से चली आ रही इसी परंपरा की अभ्यस्त भी हो गई थीं. यदि कोई महिला अपनी रक्षा हेतु शस्त्र उठाती या अपने अधिकारों हेतु ऊंची आवाज में भी बात करती तो महिलाएं ही उसका उपहास करने लगतीं. तत्कालीन समाज में सेना में स्त्री तो पूर्णतः वर्जित थी यही नहीं निम्म जाति की स्त्री के लिए तो स्थिति और भी खराब थी.

राजा गंगाधर की मृत्यु के बाद जैसे ही अंग्रेजो ने झांसी की सत्ता रानी से छीनने की घोषणा की वैसे ही वफादारी का दावा करने वाले कई जमीदार और साहूकार रानी से किनारा करने लगे. रानी ने अंग्रेजो को दो टूक शब्दों में कह दिया कि झांसी किसी को नहीं दी जायेगी.

विपत्ति की इस घड़ी में झलकारी से रहा नहीं गया वह राजमहल में रानी से मिलने जा पहुंची. अंग्रेजो से झांसी की रक्षा के लिए झलकारी व उसके पति पूरन ने स्वयं को रानी के प्रति समर्पित कर दिया. रानी लक्ष्मीबाई ने अपनी सेना में महिलाओं की बटालियन का निर्माँण किया, नेतृत्व झलकारी बाई के हाथों में था. झलकारी बाई महिलाओं को युद्धाभ्यास और अन्य सैन्य कलाएं  सीखने के लिए प्रोत्साहित करने लगी. शीघ्र ही झांसी की सेना में झलकारी बाई के नेतृत्व में सशक्त महिला टुकड़ी निर्मित हो गई.

सन् 1857 की गदर की धूल झांसी भी पहुंचने लगी अंग्रेजों के विरुद्ध बिगूल फूंक दिया गया. अंग्रेजो ने झांसी पर पूरी दम-खम के साथ हमला किया पर झलकारी बाई और पूरन ने विभिन्न मोर्चों पर अंग्रेजों को शिकस्त दी. अंग्रेजो का दवाब लगातार बढ़ रहा था. झलकारी को चिंता थी कि कहीं रानी अंग्रेजों के हाथों में न पड़ जाए अतः झलकारी ने रानी से सुरक्षित स्थान पर चले जाने का अनुरोध किया. यह भी उम्मीद थी कि कानपुर की ओर से तात्या टोपे सेना लेकर यदि समय पर पहुंच जायें तो अंग्रेजो की पराजय तय है. किन्तु तभी सूचना मिली कि धोखे से तात्या टोपे को अंग्रेजों ने परास्त कर दिया है और तात्या टोपे से मिलने वाली सहायता की उम्मीद भी खत्म हो चुकी थी. अंग्रेजों को भ्रम में डालने के लिए झलकारी, रानी लक्ष्मी बाई के भेष में किले की प्राचीर पर चढ़कर सैनिकों का उत्साह बढाने लगी किन्तु इसी दौरान अंग्रेजों की तोपों की मार से पूरन को वीर गति प्राप्त हुई. झलकारी का हृदय चीत्कार उठा पर उसे झांसी और झांसी रानी दोनों के प्रति अपने दायित्वों का बोध था. झलकारी ने एक बार अश्रुपूर्ण आंखों से पूरन के शहीद हुए शरीर को देखा, दूसरे ही पल गरजकर उसने अंग्रेजों पर और तीव्र हमले का आदेश दिया.

झांसी को उस वक्त अंग्रेज कमांडर ह्यूरोज ने घेर रखा था. झलकारी बाई रानी के भेष में कमाण्डर के कैम्प तक पहुंची कमाण्डर अपने सामने झांसी रानी को खड़े देख हैरान था लेकिन तभी दुल्हाजू नामक अंग्रेजों के वफादार जमींदार ने ह्यूरोज के समक्ष झलकारी बाई की हकीकत बता दी. ह्यूरोज ने सैनिको को झलकारी बाई को मारने के आदेश दिए. इस घड़ी में झलकारी वीरता से लड़ी. न जाने ह्यूरोज के मन में क्या आया उसने अपने सिपाहियों को रुकने का आदेश दे दिया.

ह्यूरोज को रानी झांसी के ठिकाने का पता चल चुका था. ह्यूरोज अपनी सेना लेकर रानी लक्ष्मीबाई के ठिकाने की ओर लपका, हताश झलकारी अपनी कोरियों के टोले में लौट आई. रानी झांसी ने वीरतापूर्वक युद्ध करते हुए स्वयं को मृत्यु के हवाले कर दिया. हालांकि, युद्ध अभी रूका नहीं था और झलकारी एक बार पुनः महिलाओं की टुकड़ी बनाने और झांसी को स्वतंत्र करने में जुट गई. झलकारी बाई की सफलता-असफलता इसमें नही है कि उसने क्या पाया था या खोया. महत्वपूर्ण यह है कि झलकारी उस समाज का हिस्सा थी, जहां चेतना का अभाव था. उसने निःस्वार्थ भाव से अपना जीवन झांसी को अर्पित कर दिया जबकि वे समुदाय जो देश के इतिहास निर्माण का दावा करती हैं, वे आपसी झगड़े व विश्वासघात में लगे रहे. झलकारी बाई को इतिहास ने वह स्थान भी नहीं दिया जिसकी वह योग्य थी.

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