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लड़की की एक शिकायत पर क्यों टूट पड़ती हैं हजारों विरोधी आवाजें

वर्णिका कुंडु के पीछा करने और अपहरण का प्रयास करने के मामले कई तरह के कुतर्क सुनने को मिल रहे हैं. जैसे वो रात को बाहर ही क्यों निकली थी? उसने शराब पी थी. सिर्फ पीछा ही तो किया था. ऐसा पहली बार नहीं है कि किसी लड़की की शिकायत पर ऐसे कुतर्क दिए जा रहे हों. निर्भया, उबर जैसे मामलों में भी यही स्थिति थी. इतना ही नहीं अगर आसपास के मोहल्ले में कोई लड़की किसी लड़के के परेशान करने पर शिकायत करती है तो पहला सवाल उसी लड़की पर होता है कि कोई लड़का तुझे ही क्यों परेशान कर रहा है? या तू फलाना रास्ते से जाती ही क्यों है?

जब प्रीति जिंटा ने नेस वाडिया पर मारपीट का आरोप लगाया था तो भी कुछ ऐसी बातें सुनने को मिली थीं कि संपत्ति का मामला होगा इसलिए शिकायत कर रही है जबकि इस मामले में सीसीटीवी फुटेज तक मिली थी. जिस तरीके से संभव था तर्क, कुतर्क और घटिया मजाक, लेकिन यह अस्वीकारने की कोशिश की गई कि नेस वाडिया ने बदतमीजी की होगी.

दरअसल, जब भी कोई लड़की किसी पुरुष या पुरुष पक्ष से जुड़े लोगों यानि परिवार के सदस्यों के खिलाफ शिकायत करती है तो एक पूरी जमात उस मामले को पूरा जाने बिना खारिज करने की भरपूर कोशिश करती है. इसी कोशिश में वो लड़की का करैक्टर असेसिनेशन से लेकर तरह-तरह के हथकंडे अपनाते हंै जबकि मैंने लड़कों के मामले में ऐसा नहीं देखा कि लड़के द्वारा की गई शिकायत पर इतना नकारात्मक सोचा गया हो या लड़के का करेक्टर असेसिनेशन हुआ हो.

देर रात पार्टी करके घर लौट रहे लड़के से अगर कुछ गुंडे छीना-झपटी और मारपीट कर देते हैं तो उस लड़के से सहानुभूति ही जताई जाती है। रात में पीकर क्यों आ रहा था कोई नहीं पूछता. अगर बहू का सास-ससुर पर अत्याचार करते कोई वीडियो आ जाए तो ये सवाल कोई नहीं उठाता कि उसके पीछे की वजहें क्या हो सकती हैं? हो सकता है कि बहू को पहले से इस हद तक प्रताड़ित किया गया हो कि वो मारने पर मजबूर हो गई हो? तब इनका गोली की रफ्तार से चलने वाला दिमाग रुक जाता है.

आखिर एक ही वर्ग के आरोपों और शिकायतों का इतना विरोध क्यों? इसकी वजह है डर जो एकदम से कौंधता है और तुरंत फैसला सुना देता है. इस जमात का डर है कि वो औरत जो इस पुरुषहित केंद्रित समाज द्वारा बनाए गए नियमों पर चल रही थी आज उस पर सवाल कैसे उठा रही है. हमारी सत्ता, हमारे वर्ग को चुनौती दे रही है. अपनी जड़ें हिलती हुई महसूस होती है. जिसे सिर्फ सहना सिखाया था वो तो आज आंखें दिखा रही है. हमारी धौंस कुछ कम हो रही है.

इस संबंध में ऑल इंडिया प्रोग्रेसिव वुमंस एसोसिएशन की सचिव कविता कृष्णन कहती हैं, ‘लड़कियां शिकायत करें  और न करें दोनों ही स्थितियों पर उन पर दबाव बनता है. इस तरह उन्हें चुप कराने और पीछे धकलने की कोशिश होती है क्योंकि लोगों द्वारा दिए जा रहे तर्क अपने आप में गलत होते हैं. रात को लड़की क्यों न निकले. गलत वो नहीं है जो रात को निकली बल्कि गलत वो हैं जो रात को शराब पीकर किसी लड़की का पीछा कर रहे थे.

दरअसल, एक लंबे समय में बहुत चालाकी से पुरुष औरत का भक्षक और रक्षक दोनों बन गया है. जहां भक्षक बनकर डर से मुंह बंद कराया गया वहां रक्षक बनकर अहसान जताया गया. लेकिन, आज तुम्हारे भक्षक होने पर वो सवाल खड़े करती है और अपनी रक्षा के लिए तुम्हें चुनने से भी इनकार करती है. आज वो असहाय होकर सब सहती नहीं बल्कि कानून की मदद से आवाज उठाती है. इस समाज के लिए तो जैसे दुनिया ही पलट गई है. इल्जाम लगाने वाले के ऊपर इल्जाम लग रहे हैं और सजा भी हो रही है.

लोगों के इस विरोध के संबंध में सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका कमला भसीन का कहना है, ‘कुछ लोगों को बेहवजह लगता है कि उनका सिंहासन हिल रहा है. अगर औरत की आजादी को हौवा बनाकर डरना बेतुका है.वह बताती हैं कि इस विरोध के पीछे असुरक्षा का भाव भी होता है. यह असुरक्षा लड़कियों की सफलता, उनके नौकरी करने, शिक्षा पाने और उनकी उपलब्धियों से पनपती है और लगता है कि अब स्त्री या तो पुरुष के बराबर आ रही है या उसे पीछे छोड़ रही है. जब भी इस तरह की घटना होती है तो ये जलन और असुरक्षा भी कहीं न कहीं विरोध का कारण बनते हैं.

साथ ही एक डर और पैदा होता है कि अगर उस मर्द के अपराधों पर सवाल उठ रहे हैं और हम स्वीकार कर लेते हैं तो कल को हमारे छोटे-बड़े अपराधों पर पर्दा कैसे ढकेगा. हम कैसे अपने अपराध को जायज ठहराएंगे. इसलिए लड़की की आवाज दबाने की हर संभव कोशिश होती है. उलटा उस पर सवाल उठाए जाते हैं. वो सवाल जो ऐसे नियमों पर आधारित हैं जो पुरुषकेंद्रित समाज द्वारा और उसके हित में बनाए गए हैं.

देर रात लड़कियों का नहीं निकलना या किसी पुरुष का साथ में होना, ये नियम स्त्री ने अपने लिए नहीं बनाया है बल्कि उसकी स्वतंत्रता बाधित करने के लिए गढ़ा गया है. अगर देर रात अपने भाई, पति और पति के साथ होने पर स्त्री के साथ अपराध होता है तो ‘देर रात’ का सवाल नहीं उठेता क्योंकि तब वो किसी समाज द्वारा जायज रिश्ते में बंधे पुरुष की सहमति और संरक्षण में बाहर होती है. यानि उसके लिए पुरुष की सहमति की जरूरत अनिवार्य हो जाती है. इन एकपक्षीय हित वाले नियमों का जवाब स्त्री क्यों दें?

लोगों द्वारा रात को बाहर निकलने और शराब पीने पर उठाए जा रहे सवालों पर कमला भसीन कहती हैं कि ये सत्ता 3-4 हजार सालों से चल रही है. इसमें तय किया गया है कि बाहर की सारी जगहें पुरुषों के लिए हैं और स्त्री के लिए है सिर्फ घर. संविधान में तो सब बराबर हैं. या तो संविधान में लिख दीजिए कि औरत बस घर पर रहेगी. यह बहुत अच्छी बात है कि लोग वर्णिका कुंडों के समर्थन में भी उठ रहे हैं. यह समर्थन उस विचारधारा के विरोध का तरीका है. बलात्कार इसलिए किया जाता है कि 1 का होने पर 50 लड़कियां घर बैठ जाएं. लेकिन, हमें लड़कियों को ज्यादा से ज्यादा बाहर निकालना चाहिए.

इस पर कविता कृष्णन का मानना है कि इस तरह विरोध ये संदेश देता है कि अगर लड़कियां रात को निकलेंगी तो अपराध होगी ही. वहीं, घटनाएं सिर्फ रात में ही नहीं होतीं. चंडीगढ़ में कुछ जगहों पर दिन में शराब पीकर लड़कियों का पीछे करने का चलन है. घरों में भी हिंसा होती है. औरत चारदीवारी में भी कहां सुरक्षित है. यह कुर्तक सिर्फ स्त्री विरोधी नहीं पुरुष विरोधी भी है जो पुरुष की ऐसी छवि बनाता है कि वो तो अपराध करेगा ही अगर बचना है तो स्त्री छुप जाए. जबकि हर पुरुष भी अपराधी नहीं होना चाहेगा.

दरअसल, इस विरोध और कुतर्कों पर गुस्सा तो आता है लेकिन सामने वाले में एक बौखलाहट भी नजर आती है. फिर लगता है कि इन सवालों से घबराने की जरूरत नहीं. ये तो स्त्री के विरोध स्वर दबाकर अपना सिंहासन हिलने से बचाने की कोशिश है. हमें बस अपने रास्ते पर बढ़ते जाने की जरूरत है. रोकने वाला तो हर संभव कोशिश करेगा ही.

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