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घरेलू हिंसा के विरूद्ध कानून देता है ये अधिकार

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक साल 2013 में घरेलू हिंसा के 118866 मामले दर्ज किए गए हैं. साल 2012 के मुकाबले 2013 में इन घटनाओं में 11.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. भारत में अधिकतर महिलाएं किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा झेलती हैं, जो कई बार हत्या में भी तब्दील हो जाती है. इन घटनाओं के बढ़ने का एक बड़ा कराण है महिलाओं को घरेलू हिंसा के विरूद्ध कानून की जानकारी न होना. कई बार तो महिलाएं जानती ही नहीं की उनके साथ हो रहा दुर्व्यवहार घरेलू हिंसा के दायरे में आता है. अपने अधिकारों की जानकारी  के अभाव में वो इन ज्यादतियों को सहन करती जाती हैं. इस बार हम घरेलू हिंसा के विरुद्ध बने कानून महिला सरंक्षण अधिनियम 2005 की विस्तृत जानकारी दे रहे हैं:

कोई व्यक्ति अगर किसी महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा को नुकसान पहुंचाता है, उसे क्षतिग्रस्त करता है या खतरा उत्पन्न करता है या फिर ऐसा करने की कोशिश करता है, तो उसे घरेलू हिंसा की श्रेणी में रखा जाएगा. इसके अंतर्गत शारीरिक दुरुपयोग, लैंगिक दुरूपयोग, मौखिक व भावनात्मक दुरुपयोग और आर्थिक दुरुपयोग शामिल हैं. दहेज या अन्य मूल्यवान वस्तुओं या गैरकानूनी मांग की पूर्ति के लिए महिला को या उससे संबंधित व्यक्ति को परेशान करने के मकसद से महिला को उत्पीडि़त करता है, क्षति पहुंचाता है या खतरा उत्पन्न करता है, तो भी उसे घरेलू हिंसा की श्रेणी में रखा जाएगा.

शारीरिक दुरुपयोग

शारीरिक दुरुपयोग का मतलब है कि कोई भी कार्य या आचरण जो कि महिला के जीवन अंग या स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा करता है. जैसे मारपीट करना, धकेलना, ठोकर मारना, लात मारना, मुक्का मारना,किसी अन्य प्रकार से शारीरिक पीड़ा या क्षति पहुंचाना.

लैंगिक (यौन) दुरुपयोग

लैंगिक प्रकृति का कोई भी व्यवहार जो महिला की गरिमा का दुरुपयोग करता है, अपमानित करता है, तिरस्कृत करता है या उसको भंग करता है. जैसे बलात्कार करना, अश्लील साहित्य या अश्लील तस्वीरों को देखने के लिए विवश करना, महिला के साथ दुर्व्यवहार करना, महिला की पारिवारिक और सामाजिक प्रतिष्ठा को आहत करना.

मौखिक और भावनात्मक दुरुपयोग

अपमान,  मजाक उड़ाना, तिरस्कार करना, गाली देना और संतान विशेषकर लड़का नहीं होने पर अपमानित करना और हंसी उड़ाना, महिला को शारीरिक कष्ट पहुंचाना या उससे संबंधित किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की धमकियां देना.

आर्थिक दुरुपयोग

कोई भी या सभी आर्थिक या वित्तीय स्रोत जिसकी महिला विधि या प्रथा के तहत हकदार है. किसी महिला और उसकी संतानों को घर से वंचित करना. इसमें स्त्रीधन,संयुक्त संपत्ति, साझी गृहस्थी के इस्तेमाल से अलग करना शामिल है. 

घरेलू हिंसा की सूचना  

पीडि़त महिला के अलावा कोई भी पड़ोसी, परिवार का सदस्य या संस्थाएं महिला की सहमति से अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट के कोर्ट में शिकायत दर्ज कराकर बचावकारी आदेश हासिल कर सकता/ सकती हैं.

सूचना देने वाले व्यक्ति का कानून में कोई दायित्व नहीं है.

घरेलू घटना रपट (डोमेस्टिक इंसिडेंट रिपोर्ट) एक दफ्तरी प्रारूप है जिसमें घरेलू हिंसा की रिपोर्ट दर्ज करायी जाती है. 

पुलिस अधिकारी, संरक्षण अधिकारी और मजिस्ट्रेट के कर्तव्य

व्यथित महिला के लिए बचावकारी आदेश, काउंसलिंग, क्षतिपूर्ति, भरण-पोषण, बच्चों का संरक्षण और जरूरत पड़े तो रहने की जगह भी दी जाती है. अगर पीडि़त की रिपोर्ट से जज को ऐसा लगे कि पीडि़त को हिंसा करने वाले से आगे भी खतरा हो सकता है तो जज हिंसा करने वाले को घर से बाहर रहने के आदेश दे सकते हैं.

इस कानून के अंतर्गत नियुक्त प्रोटेक्शन ऑफिसर (संरक्षण अधिकारी) की जिम्मेदारी है कि पीडि़त महिला को आवेदन लिखने में मदद करे, आवेदन जज तक पहुंचाए एवं कोर्ट से राहत दिलाए.

व्यथित महिला को संरक्षण अधिकारी की सेवाओं की उपलब्धता के बारे में सूचना देना .

विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम 1987 के अधीन निशुल्क विधिक सेवाओं की उपलब्धता के बारे में सूचना देना .

भारतीय दंड संहिता की धारा 498 के अधीन शिकायत दाखिल करने के अधिकार के बारे में सूचना देना. 

संरक्षण अधिकारी के कर्तव्य

महिला संरक्षण अधिनियम की धारा 9 के अंतर्गत संरक्षण अधिकारियों के कर्तव्य:

मजिस्ट्रेट को घरेलू हिंसा की रिपोर्ट करना. अगर व्यथित महिला चाहती है तो मजिस्ट्रेट को संरक्षण आदेश देने के लिए प्रार्थना करना,

यह सुनिश्चित करना कि व्यथित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम के अधीन कानूनी सहायता दी गयी है .

यदि महिला चाहती है तो उसे सुरक्षित गृह उपलब्ध कराना. अगर चोट लगी है तो व्यथित महिला की चिकित्सकीय जांच कराना .

यह सुनिश्चित करना कि धारा 20 के अधीन धन देने के आदेश का अनुपालन और निष्पादन भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत किया गया है .

संरक्षण अधिकारी पर कार्यवाही

कर्तव्यों का पालन न करने पर संरक्षण अधिकारी को  एक वर्ष तक का कारावास या 20000 तक जुर्माना या दोनों दंड दिया जा सकता है.

सेवा प्रदाता

कोई स्वैच्छिक संघ या कंपनी जो कि सोसायटी पंजीकरण अधिनियम 1860 के अधीन पंजीकृत है, सेवा प्रदाता है.

सेवा प्रदाता की शक्तियां

घरेलू घटना की रिपोर्ट को दर्ज करना. व्यथित महिला की डॉक्टरी जांच कराना तथा यह सुनिश्चित करना कि व्यथित महिला को  घर में रहने को जगह मिल जाए, अगर महिला ऐसी अपेक्षा करती है .

केंद्र और राज्य सरकार के उपाय 

अधिनियम की धारा 11 केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा निम्नलिखित कार्यों को सुनिश्चित किये जाने का जिक्र करती है:

महिला संरक्षण अधिनियम के उपबंधों का नियमित रूप से टेलीविजन, रेडियो और प्रिंट मीडिया के माध्मय से व्यापक प्रचार किया जाता है

पुलिस अधिकारियों और न्यायिक सेवा के सदस्यों को शामिल करके सरकारी अधिकारियों को अधिनियम द्वारा वर्णित मुद्दों पर संवेदीकरण और जानकारी प्रशिक्षण दिया जाता है.

गृह मामलों, विधि और व्यवस्था, स्वास्थ्य और मानव संसाधन से संबंधित मंत्रालयों और विभागों के बीच घरेलू हिंसा के विवादों पर उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली सेवाओं में तालमेल किया गया है.

सहायता के आदेशों की प्राप्ति

कोई व्यथित महिला या संरक्षण अधिकारी या व्यथित महिला की ओर से कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अंतर्गत एक या अधिक सहायता प्राप्त करने के लिए मजिस्ट्रेट को आवेदन पेश कर सकता है. इसके अंतर्गत क्षतिपूर्ति मुआवजा भी शामिल है .

मजिस्ट्रेट, सुनवाई की पहली तारीख नियत करेगा जो न्यायालय द्वारा आवेदन प्राप्त होने की तारीख से सामान्यता तीन दिन से अधिक नहीं होगी.

मजिस्ट्रेट, सुनवाई की पहली तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर प्रत्यके आवेदन का निपटारा करने का प्रयास करेगा.

सहायता के लिए किए गए आवेदन की सुनवाई की तारीख संबंधी सूचना मजिस्ट्रेट द्वारा संरक्षण अधिकारी को दी जायेगी, जो प्रतिवादी या मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित किसी अन्य व्यक्ति से दो दिन के अंदर तामील कराएगा.

अगर मजिस्ट्रेट को ऐसा लगे कि दोनों पक्ष बंद कमरे में कार्यवाही की सुनवाई चाहते हैं, तो इस अधिनियम के तहत कार्यवाही की सुनवाई बंद कमरे में हो सकती है .

अधिनियम की धारा 17के मुताबिक किसी अन्य विधि में किसी विरोधी प्रावधान के होते हुए भी घरेलू संबंध में प्रत्येक महिला को साझी गृहस्थी से कानूनी तरीके से ही बेदखल या निकाला जा सकता है .

धारा 19के मुताबिक मजिस्ट्रेट यह संतुष्ट होने पर कि घरेलू हिंसा की गयी है, प्रतिवादी द्वारा महिला को साझी गृहस्थी से बेदखल करने या उसके कब्जे में व्यवधान करने से रोक सकता है .

मजिस्ट्रेट साझी गृहस्थी, जिसमें महिला निवास करती है या उसके किसी भाग में प्रतिवादी या उसके किसी नातेदार को प्रवेश करने से रोक सकता है .

मजिस्ट्रेट साझे घर को किसी को सौंपने या उसको बेचने या उसको ऋणग्रस्त करने से प्रतिवादी को रोक सकता है .

प्रतिवादी को आदेश दिया जा सकता है कि व्यथित महिला को उसी स्तर का, जैसा साझी गृहस्थी में उसके द्वारा उपयोग किया जाता रहा है, वैकल्पिक आवास सुनिश्चित करे या उसके लिए किराये का भुगतान करे.

न्यायालय, संबंधित थाने के इंचार्ज अधिकारी को व्यथित महिला को संरक्षण प्रदान करने या आवास आदेश को लागू करने में सहायता करने के निर्देश जारी कर सकते हैं .

मजिस्ट्रेट, व्यथित महिला और उसकी संतान को घरेलू हिंसा के परिणाम स्वरूप हुए नुकसान और खर्चों को देने के लिए प्रतिवादी को आदेश जारी कर सकते हैं. इसमें कमाई का नुकसान, चिकित्सकीय व्यय संपत्ति को हटाने या नष्ट करने में हुई हानियां शामिल हैं.

मजिस्ट्रेट, धन की राहत का भुगतान करने के लिए प्रतिवादी की असफलता पर मजिस्ट्रेट प्रतिवादी को काम देने वाले मालिक या कर्जदार को सीधे व्यथित महिला को भुगतान करने के निर्देश जारी कर सकते हैं.

मजिस्ट्रेट, आवेदन की सुनवाई में व्यथित महिला को या उसकी ओर से आवेदन करने वाले व्यक्ति को बच्चे की अस्थायी हिफाजत प्रदान कर सकेगा और प्रतिवादी द्वारा ऐसे शिशु से मिलने के लिए विशेष व्यवस्था भी करेगा.

प्रतिवादी द्वारा संरक्षण आदेश या संरक्षण आदेश के किसी अंतरिम आदेश को न मानना एक अपराध होगा, जिसकी सजा एक वर्ष हो सकती है या फिर जुर्माना जो कि 20000 तक बढ़ाया जा सकता है या फिर दोनों हो सकते हैं .

संरक्षण आदेश का उल्लंघन संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है. न्यायालय व्यथित महिला की एकमात्र गवाही पर यह निष्कर्ष निकाल सकती है कि अपराध हुआ है. 

केस दर्ज करने के स्थान

  • जहां व्यथित महिला स्थायी रुप से या अस्थायी रुप से निवास करती है या नियोजित है.
  • जहां प्रत्यर्थी निवास करता है या कारोबार करता है या नियोजित है.
  • जहां कार्रवाई का कारण पैदा हुआ है.

महिला संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ सत्र न्यायालय में व्यथित महिला या प्रत्यर्थी पर आदेश की तामील के 30 दिनों के अंदर अपील की जा सकती है.

पीडि़ता किससे संपर्क करे

पीडि़त महिला घरेलू हिंसा से संबंधित अधिकारी जैसे उपनिदेशक, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, बाल विकास परियोजना अधिकारी आदि से शिकायत दर्ज करा सकती है. किसी भी सरकारी या गैर सरकारी संगठन से संपर्क किया जा सकता है जो महिलाओं और बच्चों के लिए काम करती हो. पुलिस स्टेशन से संपर्क कर सकती है. किसी भी सहयोगी के माध्यम से अथवा स्वयं जिला न्यायालय में प्रार्थना पत्र डाल सकती है.

 

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